Friday, May 18, 2012

प्रमाद ?

प्रमाद का अर्थ है - अध्यात्म के प्रति आतंरिक अनुत्साह |
साधारण भाषा में आलस्य कहते हैं, पर धर्म में रूचि न होना ही प्रमाद कहा गया है |
संसारी व्यक्ति हैं, दिन-भर में सैकड़ों काम हैं, कर्त्तव्य हैं, उन्हें करना ही चाहिए |
पर जब समय हो और उसे यूँही इधर-उधर में व्यतीत कर देना प्रमाद है |

श्रावक के ३ मनोरथ

श्रावक के ३ मनोरथ -
१. श्रावक यह भावना भाये कि वह शुभ दिन कब आएगा जब मैं अल्प या अधिक परिग्रह का त्याग करूंगा |
२. श्रावक यह चिंतन करे कि वह शुभ समय कब प्राप्त होगा जब मैं गृहस्थावास को छोड़कर संयम ग्रहण करूंगा |
३. श्रावक यह विचार करे कि वह मंगल बेला कब आएगी जब मैं अंतिम समय संलेखना व अनशन कर, 
मरण की इच्छा न करता हुआ समाधि मरण को प्राप्त करूंगा |

सामायिक-पाठ


सामायिक-पाठ
सामायिक शुरू करने से पहले वंदन-पाठ ( तिक्खुत्तो ) पढना चाहिए |
सामायिक ऐसे करें -
वंदे अर्हम       - ३ बार
वन्दे गुरुवरम  - ३ बार
वंदे सच्चम    -  ३ बार
सामायिक प्रतिज्ञा -
करेमि भंते! सामाइयं ( हे भगवान् ! मैं सामायिक करता हूं |
सावज्जं जोगं ( सावद्द योग [ पापकारी प्रवृत्ति ] का )
पच्चक्खामि  ( प्रत्याख्यान करता हूं )
जाव नियमं ( सामायिक का जितना काल हो )
( मुहुत्तं एगं ) एक मुहूर्त ( ४८ मिनट )
पज्जुवासामि दुविहं ( मैं उपासना करता हूं )
तिविहेणं ( तीन योग से [मन, वचन, काया ]
न करेमि ( न करूंगा )
न कारवेमि ( न कराऊंगा )
मणसा (मन से )
वयसा (वचन से )
कायसा (काया से )
तस्स ( उन पूर्वकृत कार्यों से )
भंते! ( हे भगवन !)
पडिक्कमामि ( निवृत्त होता हूं )
निन्दामि ( निंदा करता हूं ) आत्म-साक्षी से
गरिहामि ( गुरु साक्षी से आलोचना करता हूं )
अप्पाणं वोसिरामि  (आत्मा को पाप से दूर करता हूं )
नोट- सामायिक पाठ के बाद ५ वार नवकार महामंत्र बोलें |
इसके बाद चतुर्विंशति-स्तव (लोगस्स) का पाठ अवश्य पढ़ें |


सम्यक्त्व के ५ भूषण

भगवान महावीर -
सम्यक्त्व के ५ भूषण हैं |
१. धर्म में स्थिरता 
२. प्रभावना - धर्म का महत्व बढे, वैसा कार्य करना |
३. धर्म या धर्म-गुरु के प्रति भक्ति रखना |
४. जैन शासन में कौशल प्राप्त करना 
५. तीर्थसेवा - चतुर्विध संघ को धार्मिक सहयोग देना |

वास्तविकता क्या है ?

वास्तव में संयोग दुःख है,
वियोग तो मात्र उसकी एक परिणति है |
~ आचार्य श्री तुलसी की पुस्तक " हस्ताक्षर " से

क्षणे रुष्टा: क्षणे तुष्टा :

क्षणे रुष्टा: क्षणे तुष्टा : की मनोवृत्ति कम करो - आचार्य श्री तुलसी |
( क्षणे रुष्टा: क्षणे तुष्टा : का मतलब एक क्षण में रुष्ट, एक क्षण में तुष्ट )

Monday, April 30, 2012

गुरु-वंदना

गुरु- वंदना ~
युग प्रणेता, युग प्रचेता, युग पुरुष लो वंदना |
विनयनत बद्धांजलि हम, कर रहे अभिवंदना ||
धन्य है सौभाग्य तुम से, कुशल अनुशास्ता मिले |
दिव्य जीवन पा तुम्हीं से, भव्य शतदल हैं खिले ||
तपो युग-युग धर्म शासक, जय विजय पग-पग वरो |
तुम्हीं नैया के खेवैया, पार भव जल से करो ||

~ साध्वी श्री यशोधराजी