Friday, July 6, 2012

Who I am?

If I eat too much I shall get fat (the effect of my actions).
If I control my appetite then I shall not.
If I do not control my desire for possessions then I shall get greedy and unpleasant.
If I do not control my attitudes to other living creatures then I shall get violent and unpleasant.

All these things add up: all my actions and thoughts help to make the sort of person I am.

View long term

It is true that in the short term violent or greedy or dishonest people often appear to succeed in life, to reach high positions, acquire wealth and live in comfort, even though they are feared or disliked by pleasanter, more honest people.

But Jains look at the long term. 
They see that violence and greed and dishonesty build up conditions within the individual which are certain to have their effect eventually.

तप कैसे करें ?

पोरसी को कई प्रकार से कर सकते हैं.
जैसे सुबह ९ बजे आपने नाश्ता लिया फिर १ बजे लंच लेंगे
बीच में ४ घंटे का समय है उसका सदुपयोग आप १ पारसी के प्रत्याख्यान से कर सकते हैं.
पोरसी में पानी का आगार रख सकते हैं.
केवल सूर्योदय वाली पोरसी बिना पानी के करनी होती है.


पोरसी को रात में भी कर सकते है.
जैसे रात को भोजन - दूध लेकर कुल्ला कर के 
१० बजे दो पोरसी का प्रत्याख्यान ले लिया
जो तकरीबन ७ घंटे का हुआ सुबह ५ बजे तक हम वैसे भी कुछ नहीं लेते है.
छोटी- छोटी बातों का ख्याल रखते हुए हम श्रावक भी काफी धर्म कर सकते हैं.
हाँ सब में प्रत्याख्यान जरूरी है.


समणी श्री कुसुमप्रज्ञाजी ने खुलासा किया कि
उपवास में पहले दिन सूर्यास्त के पहले भोजन करना चाहिए,
फिर दुसरे दिन पूरा दिन उपवास करें,
फिर तीसरे दिन सूर्योदय के पश्चात पारणा करें.
इस प्रकार तीन सूर्य की साक्षी से शुध्ह उपवास होता है.


चरम प्रत्याख्यान -
तप का एक प्रकार होता है
इसमें सूर्यास्त के ४८ मिनट पहले भोजन- पानी बंद कर देना चाहिए.
किसी भी तपस्या में साधारण आगार रखना चाहिए,
की भूल में हो गया.


४८ मिनट के तप का खुलासा
आपने नाश्ते में १० मिनट + दोपहर के खाने में १२ मिनट + दोपहर की चाय में ७ मिनट + शाम के भोजन में १२ मिनट = कूल ३९ मिनट
बाकी पानी का समय रख लें.
पर जागरूकता रखनी पड़ेगी.
कुछ तपस्याएँ तो हर कोई कर सकता है.
१. भोजन के बाद एक घंटे का चौविहार का त्याग 
२. रात्रि भोजन का त्याग 
३.किसी प्रिय वस्तु को छोड़ने का त्याग
४.जूठन छोड़ने का त्याग
५. अपने मुंह अपनी प्रशंसा नहीं करना 
६.निंदा सुनकर भी समभाव में रहना
७.आते क्रोध को थामना.

अनुशासन कैसे ?

शरीर मेरा नहीं है,
यह भाव जितना स्पष्ट 
और
गहरा 
होगा,
उतना ही शरीर पर हमारा अनुशासन होगा
और
शरीर पर अनुशासन होने का मतलब ही है,
सब पर अनुशासन 

केवलिगम्य कर दें

कोई प्रश्न समझ में न् आये तो उसे समझने का प्रयत्न करें और 'करते रहे" |
प्रयत्न करने पर भी समझ में न् आये तो उसे 'केवलीगम्य' कर दें,
- बुद्धि से अगम्य मान कर छोड़ दें |
किन्तु खींच-तान न् करें |
~ भिक्षु स्वामी  

गदहियाजी और बरडियाजी

वीतराग - वंदना ( चौबीसी )
क्लेश निवारक पद्य 
सरदारशहर 
श्रीचन्दजी गधिया और कस्तूरचन्दजी बरडिया के घरेलु सम्बन्ध थे 
दोनों ने कलकत्ते में नया काम शुरू किया 
संयोग की बात वि. १९५१-५२-५३ तीन साल तक लगातार फार्म घाटे में चला
लोग कहने लगे " इन बरडियों का पगफेरा ही अच्छा नहीं है "
पर श्रीचंदजी दिलेर व्यक्ति थे, बोले - " एक रोटी मुझे मिलेगी तो आधी बरडियों को भी मिलेगी "
कस्तूरीचन्दजी ने किसी सयाने से सलाह मांगी
सयाने व्यक्ति ने सुझाया
" चन्द्र चंद्रोति चंद्रेति, चन्द्र चंद्रेति शीतले
चन्द्र चन्द्र-प्रभा चन्द्र, चन्द्र चन्द्र वरानने"
माला के एक मणके पर ऊपर लिखा मंत्र पढ़ें और दुसरे पर चौबीसी का यह पद्य
" प्रभु ! लीन पनै तुम ध्यावियां, पामै इन्द्रादिक नी रिद्धि हो
बलि विविध भोग सुख सम्पदा, लहै आमोसही आदि लब्धि हो "
चौबीसी के ८ वें गीत के ४ थे पद्य से
माला शुरू हुई, श्रीचन्दजी कस्तुरीचंदजी से मिलने आये
बरडिया जी बोले - " आवो भाई श्रीचंद ! कियां आयो "
श्रीचंद्जी ने कागद निकला और कहा - कलकत्ते स्यूं समाचार है, अबै देणो कोनी रह्यो ( अनुवाद - कलकत्ते से समाचार है, घाटा नहीं रहा )
कस्तूरीचन्दजी बोले - " हैं ! अब मैं मर ज्यावां तो धोखो कोनी, धर्म रो शरणों राखज्यो ! सुखी रहीज्यो " ( अनुवाद- अब मैं मर जाऊं तो अफ़सोस नहीं है, धरम की शरण रखना, सुखी रहना )
श्रीचंद्जी गली के नुक्कड़ भी नहीं पहुंचे थे कि पीछे से आवाज़ आयी - सेठा !
वापस लौटे, कस्तुरिचंदजी गुनगुना रहे थे -
" प्रभु ! लीन पने तुम ध्यावियां, पामे इन्द्रादिक नी रिद्धि हो
विविध भोग सुख सम्पदा........"

सेवा

सेवा -
१. कुछ लोग दूसरों से सेवा लेते हैं,
पर देते नहीं,
२. कुछ लोग दूसरों को सेवा देते हैं,
पर लेते नहीं,
३. कुछ लोग सेवा लेते भी हैं
और देते भी हैं,
४. कुछ लोग न सेवा लेते हैं
और न देते हैं |