Wednesday, May 29, 2013

व्यवहार में दृढ़ता लायें !!!

व्यवहार में दृढ़ता लायें !!!
अपने व्यवहार मे दृढ़ता लाने के लिए नकारात्मक भाषणो व विचारो से बचना चाहिए,
जैसे " हो सकता है, मै गलती पर था या क्या तुम मेरे लिए ऐसा नही करोगे?"
ऐसे वाक्यो से आपकी दृढ़ता टूटती है |
जब भी आप किसी बात के लिए 'ना' कहना चाहे तो स्पष्ट शब्दो मे कहें |
उस समय शर्मिंदा हो कर या यह सोच कर कि सामने वाला नाराज़ होगा,
माफी मागने की जरुरत नही है |
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कई बार दृढता और आत्म-सम्मान की कमी को आपस मे जोड कर देखा जाता है |
आत्म-सम्मान की कमी होने से इंसान अपने आप को हीन महसूस करता है और
वह सब के सामने बोल नही पाता |
यह मनुष्य को कई तरह से प्रभावित करती है |
कई लोग इसकी वजह से गुस्सैल और आक्रामक हो जाते है |
यही बर्ताव उन्हे और भी बुरा बना देता है |
कुछ मामलों मे बीती बातें याद करके, दृढता अपनाने से हिचकते हैं;
क्योकि वह दुसरो को नाराज़ नही करना चाहते |
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यदि आपने दृढ रवैया नही अपनाया तो
आपके साथ या नीचे काम करने वाले आपकी योग्यताओ व रवैये को गंभीरता से नही लेगें |
यदि मीटिगं आदि मे आपने दृढता से अपना पक्ष नही रखा या
दुसरो की अप्रसन्नता के भय से अपना मत व्यक्त नही किया तो
बाँस को आपकी योग्यता पर संदेह होने लगेगा |
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इस तरह से दूसरे लोग आसानी से आपसे फायदा उठा सकते हैं और
आपकी योग्यता पर संदेह कर सकते है |
कुछ लोग बिना किसी वजह के ही माफी माँगते रह्ते है |
यह उनकी अपनी शक्तिहीनता का संकेत होता है |
जब तक आपने कोई गलती नही की, तो केवल एक 'साँरी' आपको दोषी बना सकता है |
किसी भी परेशानी मे अपने परिवार व दोस्तो की मदद लें |
दायित्व व परिस्थितियो से मुँह न मोड़ें |
लगातार अभ्यास से अपने भीतर दृढता पैदा करें |
यदि आप कही दृढता नही दिखा पाते तो
शर्मिन्दा होने की बजाए अपने-आपसे वादा करें कि
आप अगली बार ऐसा नही होने देंगे |
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मनचाहा फल मिले या नही, अपने आपको प्रोत्साहित करते रहें |
बेचैनी और व्याकुलता से बचें |
अतीत से छूट्कर जीवन की नई यात्रा मे उसका साथ दें |
अपने हृदय से सारी घृणा निकाल कर इसे प्रेम से लबालब भर दे,
हालांकि यह इतना आसान नही है;
परन्तु लगातार प्रयास से संभव है |
ऐसा करने पर ही आप स्वंय को मुक्‍त अनुभव कर पाएंगे |

Sunday, November 18, 2012

निंदक नियरे राखिये



कबीर ने कहा है, निंदक नियरेराखिए..।
इसका अर्थ है कि हमें निंदक को अपने निकट रखना चाहिए।
लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं कहा है कि हम दूसरों की निंदा में ही अपना समय व्यतीत करें।
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सच तो यह है कि हम स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ साबित करने के लिए उनकी निंदा करते हैं।
वास्तव में, मानव मन निर्मल और पवित्र होता है।
आप अपने मन में जैसी भावनाओं का संचार करते हैं,
दूसरों के सम्मुख वैसे ही विचार प्रकट करते हैं।
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फिर मानव मन अपने संकल्प सागर में निंदा के कंकड-पत्थर की सृष्टि क्यों करता है?
हो सकता है कि इसके पीछे हमारा दूसरे व्यक्ति को सुधारने का विचार काम करता हो!
पर क्या निंदा करने का उद्देश्य उस व्यक्ति की भूलें बताकर उसे सन्मार्ग पर लाना होता है?
यदि यह सच है, तो पीठ पीछे दोष-चर्चा से कोई लाभ सिद्ध नहीं हो सकता है।
प्रत्यक्ष में संबंधित व्यक्ति की भूलों की ओर संकेत करने से ही यह संभव हो सकता है।
वास्तव में, निंदा का उद्देश्य सहज प्रयत्न से अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करना होता है।
अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करना मानवीय अहम की दुर्बलता है।
जब हम किसी व्यक्ति की निंदा करते हैं,
तो उसके पीछे यह भाव छिपा होता है कि
दूसरे व्यक्ति कितने अधूरे हैं और बुराइयों के पुतले हैं,
लेकिन मैं जिन बुराइयों की ओर संकेत कर रहा हूं, इनसे अछूता हूं।
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जिस व्यक्ति से हम किसी और व्यक्ति की निंदा करते हैं,
तो उस पर इसका विपरीत प्रभाव पडता है।
निंदा सुनने वाला व्यक्ति निंदा करने वाले को ऐसा कमजोर व्यक्ति मान लेता है,
जो स्वयं अधूरा है।
दूसरे व्यक्ति पर निंदा का कीचड फेंककर वह स्वयं उजला बनने की कोशिश कर रहा है।
निंदा करने वाले व्यक्ति का यह तर्क हो सकता है कि
वह बुराइयां बताकर संबंधित व्यक्ति को आगाह कर रहा है।
यानी वह सामने वाले व्यक्ति को अपना मित्र मान रहा है।
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इसके ठीक उलट नीतिकारकहते हैं कि सच्चा मित्र वही है,
जो मित्र की बुराइयों को छिपा लेता है और
केवल गुणों को ही प्रकट करता है।
यहां पर यह प्रश्न उठ सकता है कि
यदि हमारा प्रिय व्यक्ति, अपने आचरण में परिवर्तन नहीं ला पा रहा है,
तब उसके अनुचित व्यवहार को समाप्त कैसे किया जाए?
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नीतिकारकहते हैं कि ऐसी स्थिति में दो उपाय बचते हैं---
उसके अवगुणों पर कोई ध्यान न दिया जाए या कोई टीका-टिप्पणी न की जाए।
दूसरा उपाय यह है कि संबंधित व्यक्ति से प्रत्यक्ष रूप से उसके अवगुणों की चर्चा की जाए और
उसे समाप्त करने का निवेदन किया जाए।
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वहीं दूसरी ओर, निंदा का प्रयोग न केवल निष्फल, बल्कि प्रत्येक दशा में आत्मघाती ही है।
निंदा करने से मनुष्यों को स्वयं की क्षति होती है।
वह न केवल हीन भावना का शिकार होता है,
बल्कि उसका आत्मविश्वास भी प्रभावित होता है।
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जब हम किसी व्यक्ति की निंदा करते हैं,
तो इसका मतलब यह है कि हमारी स्वयं की तलाश समाप्त हो चुकी है,
इसीलिए हम बाहर की ओर देखने लगे हैं।
इस प्रक्रिया में हम दूसरे व्यक्ति की बुराई करने लगते हैं।
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यदि हम दूसरों की निंदा करने के बजाय स्वयं के भीतर में झांके,
यानी आत्मा की आवाज सुनें,
तो यह हमारे लिए बेहतर होगा।
आत्मा आनंद का अनंत भंडार है।
आनंद के इस स्रोत पर नियंत्रण करना है,
तो निंदा के हलाहल को फेंकना ही होगा।
सचमुच यह एक ऐसी मदिरा है,
जिसे छोडने के लिए तीव्र संकल्प और सजगता की आवश्यकता होती है।

पर-निंदा / मनोबल बढाओ


पर-निंदा
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परनिंदा में प्रारंभ में काफी आनंद मिलता है,
लेकिन बाद में निंदा करने से मन में अशांति व्याप्त होती है और
हम हमारा जीवन दुःखों से भर लेते हैं।
प्रत्येक मनुष्य का अपना अलग दृष्टिकोण एवं स्वभाव होता है।
दूसरों के विषय में कोई अपनी कुछ भी धारणा बना सकता है।
हर मनुष्य का अपनी जीभ पर अधिकार है और
निंदा करने से किसी को रोकना संभव नहीं है।

लोग अलग-अलग कारणों से निंदा रस का पान करते हैं।
कुछ सिर्फ अपना समय काटने के लिए किसी की निंदा में लगे रहते हैं.....
तो कुछ खुद को किसी से बेहतर साबित करने के लिए निंदा को अपना नित्य का नियम बना लेते हैं।
निंदकों को संतुष्ट करना संभव नहीं है।

जिनका स्वभाव है निंदा करना,
वे किसी भी परिस्थिति में निंदा प्रवृत्ति का त्याग नहीं कर सकते हैं।
इसलिए समझदार इंसान वही है,
जो लोगों द्वारा की गई विपरीत टिप्पणियों की उपेक्षा कर अपने काम में तल्लीन रहता है।
किस-किस के मुंह पर अंकुश लगाया जाए,
कितनों का समाधान किया जाए!

प्रतिवाद में व्यर्थ समय गंवाने से बेहतर है --
अपने मनोबल को और भी अधिक बढ़ाकर जीवन में प्रगति के पथ पर आगे बढ़ते रहें।
ऐसा करने से एक दिन आपकी स्थिति काफी मजबूत हो जाएगी और
आपके निंदकों को सिवाय निराशा के कुछ भी हाथ नहीं लगेगा।

संसार में प्रत्येक जीव की रचना ईश्वर ने किसी उद्देश्य से की है।
हमें ईश्वर की किसी भी रचना का मखौल उड़ाने का अधिकार नहीं है।
इसलिए किसी की निंदा करना साक्षात परमात्मा की निंदा करने के समान है।
किसी की आलोचना से आप खुद के अहंकार को कुछ समय के लिए तो संतुष्ट कर सकते हैं
किन्तु किसी की काबिलियत, नेकी, अच्छाई और सच्चाई की संपदा को नष्ट नहीं कर सकते।
जो सूर्य की तरह प्रखर है,
उस पर निंदा के कितने ही काले बादल छा जाएं
किन्तु उसकी प्रखरता, तेजस्विता और ऊष्णता में कमी नहीं आ सकती।
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कुछ लोगों का प्रिय शगल है - दूसरों की निंदा करना। 
सदैव दूसरों में दोष ढूंढते रहना मानवीय स्वभाव का एक बड़ा अवगुण है। 
दूसरों में दोष निकालना और 
खुद को श्रेष्ठ बताना कुछ लोगों का स्वभाव होता है। 
इस तरह के लोग हमें कहीं भी आसानी से मिल जाएंगे।
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स्वयं को हानि पहंचाने वाले कृत्य करना स्व-पराजय है। 
हम सामान्यतः ईष्र्या के कारण दूसरों की बुराई कर स्वयं को हराते है। 
किसी की बुराई कर अपना समय खराब न करें।

पर-निंदा किसी भी व्यक्त्ति के लिये स्वयं के लिये हानिकारक है
पर तब भी समाज की सच्चाई को देखते हुये
एक विद्वान ने लिखा/कहा था " पर-निंदा कुशल बहुतेरे "।
" पर-निंदा " करने से सबसे बड़ा सुखा शायद ये मिलता है कि
मनुष्य अपनी भडास निकाल कर
कुछ मुक्त और सहज महसूस करता है…….
पर जब कुछ दिनों के बाद अपनी ही कही बात पर सोचने बैठ जाता है
तो पता चलने लगता है
कि शायद " पर-निंदा " से अधिक नकारात्मक कोई दूसरी चीज होना मुश्किल है
…और
व्यक्ति ये महसूस करने लगता है कि " उसे ऐसा नहीं करना चाहिए था…..",
जीवन बहुत कीमती है।
दूसरो की बुराई करना फालतू लोगों का, ईष्यालू लोगों का काम है।
बुराई सुनना व बुराई करने के क्रम में न पड़े।
इससे नकारात्मकता उपजती है व जीवन में अन्धेरा बढ़ता है।
इससे समय ,मन,तन,व धन की हानि है।
नकारात्मक आलोचना हानिप्रद है
जबकि सकारात्मक आलोचना आगे बढ़ने के लिए आवश्यक है।
जिस व्यक्ति की आलोचना की जाती है उसे तो पीड़ा होती ही है,
परन्तु जो व्यक्ति करता है वह भी पीड़ित हो जाता है,
क्योंकि वह नकारात्मक उर्जा को जन्म देता है ,
हर समय किसी को नीचा दिखाने की होड़….
हर समय किसी से आगे निकलने के लिए तरह-तरह की चालें चलना,
धोखा और फरेब से काम लेना और झूठ बोलना, चोरी करना और
ना जाने क्या क्या करता है ये मनुष्य ??
सिर्फ अपने आपको श्रेष्ठ साबित करने के लिए ...
निर्जीव कहे जाने वाले तत्व अपने अपने तरीके से जीवन चक्र में अपना अपना योगदान दिए चले
जा रहे हैं…
पर जो बड़ा है,
उसे अपने बड़े होने पर घमंड नहीं है ..
वो कभी अपने से छोटे अस्तित्व वालों को हीन या हेय दृष्टि से नहीं देखता है…
जैसे पहाड कभी चट्टान को अपने से छोटा नहीं कहता है…..
आकाश कभी पहाड को अपने से छोटा नहीं बताता है…..
मनुष्य इतना बुद्धिमान होते हुए भी निर्जीव पत्थर से भी गया गुजरा कार्य कर रहा है
मनुष्य शायद उसी दिन मनुष्य कहलाये
जब एक निर्जीव पत्थर की तरह सह अस्तित्व के सिद्धांत को अपना ले और
किसी को नीचा दिखाने की और
किसी से आगे निकल जाने के बारे में कभी भी ना सोचे…

बैर

सर्प, मगर और जहरीले जंतुओं की योनि में भी बैर को नहीं भुला पाना
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कुछ लोग किसी एक बात को पकड़ लेते हैं
और जीवन भर उसी में उलझे रहते हैं |
वह स्मृति आदमी को एक तरह से मनोरोगी बना देती है |
बैर का अनुबंध इसी तरह से होता है |
किसी से दुश्मनी हुई तो ऐसे कि
आदमी जीवन भर उसकी आंच में जलता रहता है और
अपने भावी जीवन को भी बिगाड़ लेता है |
बैर और प्रतिशोध के कारण सर्प, मगर और दुसरे जहरीले जंतुओं की योनि पाई,
लेकिन इस गति में भी वे अपने बैर को भुला नहीं सकते,
बदला लेने की ताक में रहते हैं |

- आचार्य श्री महाप्रज्ञजी

Friday, August 10, 2012

दुःख !!! नजदीकी लोगों से ही ...क्यों ?


प्रश्न - हमारे नज़दीक के लोग(ज्यादातर) ही हमें बहुत दुःख देते हैं,
इसका क्या कारण है ?
ऐसे समय क्या करना चाहिए ? -
१ उत्तर - जिनके साथ सबसे ज्यादा राग (मोह) का सम्बन्ध और
सबसे ज्यादा द्वेष का सम्बन्ध भोगना बाकी होते हैं,
वही व्यक्ति हमारे सबसे नज़दीक आते हैं |
बाकी तो दुनिया में करोड़ों लोग हैं,
लेन-देन के सम्बन्ध के बिना किसी की आंखें भी नहीं मिलती |
कौन हमारे मां-बाप बनेंगे ? कौन साथी ?
कौन भाई-बहन ?
कौन पुत्र-पुत्रवधू ?
कौन बेटी-दामाद ?
कौन पड़ोसी ?
कौन सगे-सम्बन्धी ?
---
यह सब हमारे इस सृष्टि में जन्म लेने से पहले पूर्वकृत कर्मों से तय हो जाता है |
जब कोई हमारे नज़दीक के व्यक्ति ही हमें दुःख देते हों,
तब विचार करना चाहिए कि ये मेरे सगे बने हैं,
वो भी मेरे पूर्व जन्म के लेन-देन के कारण,
मेरे जीव ने पूर्वजन्म में कभी इस जीव के साथ वैर बांधा होगा | 
चाहे आज मैं अपने आप को निर्दोष मानता हूं,
लेकिन मुझे कहां पता है कि
पूर्वजन्म में इससे भी खराब दुःख इस जीव को दिया होगा |
आज जब यह जीव मेरे साथ हिसाब पूरा करने आया है, मेरे ही कर्मों की भेंट मुझे वापस करने आया है |
तब मैं समताभाव से, सहर्ष स्वीकार करूं, तो ही इस वैर की गांठ खुलेगी, नहीं तो जन्मों-जन्मों तक चलती रहेगी |
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.... नहीं ....नहीं ....महावीर का कर्मवाद समझने के बाद मुझे इसे नहीं बढ़ाना है |
मुझे यह दुःख समताभाव से सहन करना है ... सहन करना है |
'कभी किसी व्यक्ति के साथ थोड़े समय अच्छा सम्बन्ध रहता है,
फिर वही व्यक्ति दुश्मन जैसा बन जाता है | '
तब यह समझना चाहिए कि इसके साथ राग के सम्बन्ध थे वो पुरे हुए |
और अब वैर के सम्बन्ध शुरू हुए ----ऐसा लगता है |
ऐसे समय में दो चीजें ध्यान रखनी चाहिए |
१ ) राग के सम्बन्ध उदय में हो तो बहुत खुश नहीं होना चाहिए,
अहंकार नहीं करना चाहिए, राग को चालु रखने के लिए दांवपेंच नहीं करना चाहिए |
नहीं तो ... राग के कर्मों का गुणाकार हो जाएगा |
२ ) जब द्वेष के कर्म उदय में हों तब अत्यंत दु:खी नहीं होना, विलाप नहीं करना,
दोनों सम्बन्ध समता भाव से सहन करना चाहिए |
यही विचार करना चाहिए ---
* राग भी हमेशा रहनेवाला नहीं है |
* द्वेष भी हमेशा रहनेवाला नहीं है |
 कांच के बर्तन जैसे मानव के मन का क्या भरोसा ?
द्वेष के सम्बन्ध उदय में हो,तब बीच में किसी तीसरे व्यक्ति ने ही ऐसा कराया है,
ऐसे विचार कर किसी तीसरे के प्रति द्वेष के संस्कार नहीं डालना चाहिए |
तीसरे व्यक्ति को हमेशा निमित्त (secondary cause) की तरह ही देखना चाहिए |
निमित्त को दोष नहीं देना चाहिए |
 ' मेरे नसीब में ऐसा होना ही था इसलिए यह व्यक्ति इसमें निमित्त बना |'
ऐसा सोचकर जो हो गया है उसे स्वीकार कर लेना चाहिए |
हंसते हुए स्वीकार कर लेना चाहिए |
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ऐसे समय महापुरुषों का जीवन याद करना चाहिए |
 .... खुद महावीर स्वामी की पुत्री और दामाद उनके विरुद्ध हो गए थे |
तो क्या महावीर स्वामी ने उनपर क्रोध किया ?
आपके कुछ सगों को ही आपको खराब दिखाने में ज्यादा रस होता है,
दूर की तो बात ही छोड़िये |
---
* पार्श्वनाथ भगवान को उनके सगे भाई का जीव आठ-आठ भव तक उनको मारने वाला बना |
एक छोटी सी वैर की गांठ कितना बड़ा वृक्ष बना ?
* गांधीजी को पूरी दुनिया मान देती है, लेकिन उनका खुद का पुत्र उनके विरुद्ध था |*
ईसा मसीह को कीले ठोकने वाले उनके ही व्यक्ति थे |
इन सबका विचार करके मन को समझाना चाहिए कि
" कसौटी तो सोने की ही होती है पीतल की नहीं "
यदि मैं पीतल की लाइन में हूं तो मुझे मेरी भूलें सुधारकर सोने की लाइन में आना है |
अगर मैं सोने की लाइन में हूं तो स्वयं को कर्मवाद के भरोसे छोड़ देना चाहिए |
प्रत्येक जीव हमारे साथ हिसाब पूरा करने ही आता है,
ऐसा समझकर ह्रदय में समता धारण करना चाहिए |
फिर भी यह जीव करोड़ों वर्षों के संस्कार साथ लेकर आया है;
इस कारण से शायद उस व्यक्ति पर या निमित्त पर बहुत दुःख या द्वेष भी हो सकता है ...
फिर भी जितना जल्दी बने होश में आकर ह्रदय से दुश्मन से भी क्षमा मांग लेना चाहिए |
जितना बने आत्मभाव में लीन रहना चाहिए,जिससे कर्म कटेंगे |

Thursday, August 9, 2012

संकल्प misfire

संकल्प का प्रयोग -Misfire 
कलकत्ते में एक घर में प्रवास के समय घर की बहु ने समणी जी को बताया कि मेरी सास जो ७५ वर्ष की है, दिन में २ बार नहाती हैं, वो भी ४५ मिनट तक | आप कुछ समझा सकें तो....
शाम को सास को समणी जी ने समझाया कि शरीर का इतना ममत्व सही नहीं |
सास बोली मैं भी समझती हूँ, पर बचपन से आदत है |
समणी जी ने कहा - मांजी ! एक काम करो | दिन भर " आत्मा म्हारी, शरीर न्यारो " का जाप किया करो, ३ मही
ने बाद बताना |
( नोट - आत्मा म्हारी, शरीर न्यारो का हिंदी अनुवाद = आत्मा मेरी, शरीर अलग )
३ महीने भी बीत गए |
पूरा परिवार समणी जी के दर्शन करने आया |
एकांत मिलते ही बहु बोली - समणी जी ! आपने मांजी को क्या समझाया |
अब तो वोह दोपहर में भी नहाने लगी हैं |
समणी जी भी चकित !
ये क्या हुआ |
खैर.....
सास को बुलाकर उनकी खैर-तवज्जो पूछी, फिर बोली -
आपको मन्त्र बताया था, उसका जाप करती हैं ना ?
मांजी - हां ! समणी जी |
समणी जी - नहाना कम हुआ ?
मांजी - नहीं, अब तो मैं तीन बार नहाती हूँ |
समणी जी - आप क्या जाप करती हैं ?
मांजी बोली - आत्मा न्यारी, शरीर म्हारो |
( आत्मा न्यारी, शरीर म्हारो का हिंदी अनुवाद = आत्मा अलग, शरीर मेरा )

Wednesday, August 1, 2012

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